पà¥?रियंकर अपनी à¤?क सà¥?ंदर कविता में उन परिसà¥?थितियों का ज़िकà¥?र कर रहे हैं जो कलà¥?पित और अनचाही तो हैं, शायद असंà¤à¤µ à¤à¥€, पर अजनबी नहीं लगतीं. इनके पीछे से à¤à¤µà¤¿à¤·à¥?य का सच à¤?ाà¤?कता लगता है.
…
पृथ�वी मांग लेगी
अपने नमक का मोल
मौका नहीं देगी
किसी à¤à¥€ गलती को सà¥?धारने का
क�रोध में कांपती ह�ई कह देगी
जाओ त�म�हारी लीज़ खत�म ह�ई
यह à¤à¤¾à¤°à¤¤ के à¤à¥?ज बनने का समय होगा










Comments
Comments are closed on this post.