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“सबसे बà¥?रा दिन वह होगा”

प�रियंकर अपनी �क स�ंदर कविता में उन परिस�थितियों का ज़िक�र कर रहे हैं जो कल�पित और अनचाही तो हैं, शायद असंभव भी, पर अजनबी नहीं लगतीं. इनके पीछे से भविष�य का सच �ा�कता लगता है.


पृथ�वी मांग लेगी
अपने नमक का मोल
मौका नहीं देगी
किसी भी गलती को स�धारने का
क�रोध में कांपती ह�ई कह देगी
जाओ त�म�हारी लीज़ खत�म ह�ई
यह भारत के भ�ज बनने का समय होगा

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