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पानी ग� न ऊबरे

क�या पेप�सी का विरोध करने से सबको पानी मिल जा�गा? या फिर पा�च सितारा स�कूलों को रोकने से सबको शिक�षा मिलना तय हो जा�गा? सवाल बेमानी नहीं हैं. पर इनके जवाब में नीरज का कहना है कि बात भी इतनी सीधी नहीं है. जवाब ज़रा लम�बा है, पर प� जाइये, अपना म�द�दा उन�होंने असरदार ढंग से रखा है.

जो लोग शीतलपेय के विरोध में हैं वे क�छ नहीं कर सकते. हां, यह सच है! क�योंकि ब�यूरो ऑफ़ इंडियन स�टैन�डर�ड ने संसदीय समिति के निर�देशों के अन�रूप इन दो सालों मे शीतलपेय के मानक ही निर�धारित नहीं कि� हैं. इन�ही ख़ामियों के चलते कंपनियां कोर�ट के सामने आसानी से बचकर निकल जाती है. सरकारी स�स�ती प�रायोजित होती है ताकि कंपनियों को फ़ायदा मिलता रहे. मज़ाल है कि कोई कोर�ट उनके कामों को ग़ैर वाजिब ठहरा सके. पश�चिम में इसे Crony Capitalism कहा जाता है. प�रसिद�ध लेखक गिरीश मिश�र इसे हिन�दी में ‘’चहेतों का पूंजीवाद‘’ कहते हैं.
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चाणक�य का कहना था कि ‘’राजा जब व�यवसाय करने लगे तो सम�ो राज�य की प�रजा का बंटाधार होने वाला है‘’ आज राजनीतिक ग़�लामी के दिन नहीं है लिहाज़ा हमें अपना देश आज़ाद, अपने नेता और अपना शासन दिखाई देता है..किंत� नई वैश�विक व�यवस�था आर�थिक साम�राज�यवाद की है. यदि यह ख�ली आंखों से दिखाई नहीं दे रही है तो सम�ें कि दिखाने वाला मीडिया चंद मज़बूत हाथों की कठप�तली बन च�का है.

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