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हाशिये के कवि

मेरी कविता के ताने-बाने में ग�ंथी है
उनकी दर�दआमेज़ दास�तान
दादरी से सिंगूर तक फैले किसानों का
विस�थापन रिसता है मेरी कविता से
उनके द�ख से भीगी सड़क पर
म��से कैसे चल सकेगी
�क लाख र�पये की कार

निजीकरण और मॉलमैनिया के इस
मस�त-मस�त समय में
देरी दूरी और दहशत के बावजूद
सार�वजनिक वाहन के भरोसे बैठे
हाशिये के कवि को
अपने पैरों पर भरोसा
नहीं छोड़ना चाहिये।

- प�रियंकर, अपनी कविता वृष�टि-छाया प�रदेश का कवि में

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