तारों को देखते रहें छत पर पड़े ह��
प�रत�यक�षा गर�मी से बेहाल हैं. पर आखिर कवि ठहरीं. इस बेहाली में बड़ी रूमानियत से याद कर रही हैं प�रानी गर�मियों को.
शाम का इंतज़ार रहता। आ�गन में या सामने के बरामदे में पानी बाल�टी बाल�टी फेंका जाता और पहली बौछार ज़मीन की गर�मी को उडा देती जैसे जलते तवे पर अंतिम रोटी के बाद फेंके गये पानी की हिसहिसाती बून�दें गरम सतह पर बेचैन नृत�य करतीं।
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गरà¥?मी तब à¤à¥€ पडती थी। लू वाली गरà¥?मी। चेहरे को à¤?à¥?लसा देने वाली गरà¥?मी। पसीने से नहा देनेवाली गरà¥?मी। फिर, तब की गरà¥?मी आज इतनी ठंडी कà¥?यों लग रही है?
पà¥?रतà¥?यकà¥?षा, अल गोर तो जवाब में कहेंगे - ‘गà¥?लोबल वारà¥?मिंग’. मेरे ख़याल से नॉसà¥?टैलà¥?जिया की ठंढक का à¤à¥€ कà¥?छ असर है.
























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