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चे की भारत यात�रा

जनसत�ता के संपादक ओम थानवी आजकल अपनी हालिया क�यूबा यात�रा का दिलचस�पी भरा वृत�तांत लिख रहे हैं. अविनाश उसे अपने चिट�ठे मोहल�ला पर उपलब�ध करवा रहे हैं. इसी सिलसिले में उन�होंने �क रहस�योद�घाटन-सा (कइयों के लि�) किया कि क�रांतिकारी चे गेवारा 1959 में भारत भी आ� थे. आज मोहल�ला पर है चे की ख़�द लिखी यात�रा रिपोर�ट जो भारत से वापस लौटकर उन�होंने राष�ट�रपति कास�त�रो को सौंपी. अपनी समस�याओं के लि� भारत के हल क�यूबा के हलों से क�यों अलग हैं, इस सम� ने उनके नज़रि� को परिपक�वता दी है. लिखते हैं,

यह बह�विध और बह�त बड़ा देश अनेक प�रथाओं और रूढ़�ियों का देश है। जिन सामाजिक समस��याओं में हम जी रहे हैं, उनसे उपजे हमारे विचार, उन प�रथाओं और रू�ढ़�ियों से बिल��क�ल भिन��न हैं। सामाजिक-आर�थिक ढांचा हमारा �क सा है। ग़�लामी और औपनिवेशीकरण का वही अतीत, विकास की सीध की दिशा भी वही। इसके बावजूद कि ये तमाम हल काफी मिलते-ज�लते हैं और उद�देश��य भी �क ही है, फिर भी इनमें दिन-रात का अंतर है। �क ओर जहां भूमि स�धार की आंधी ने कांपाग��वैइ (क��यूबा) की ज़मींदारी को �क ही �टके में हिला कर रख दिया और पूरे देश में किसानों को म�फ�त ज़मीन बांटते ह�� वह अनवरत रूप से आगे बढ़ रही है : वहीं महान भारत अपनी स�विचारित और शांत पूर�वी अदा के साथ बड़े-बड़े ज़मींदारों को वहां के किसानों को भूदान कर उनके साथ न��याय करना सम�ा रहा है।

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