जनसतà¥?ता के संपादक ओम थानवी आजकल अपनी हालिया कà¥?यूबा यातà¥?रा का दिलचसà¥?पी à¤à¤°à¤¾ वृतà¥?तांत लिख रहे हैं. अविनाश उसे अपने चिटà¥?ठे मोहलà¥?ला पर उपलबà¥?ध करवा रहे हैं. इसी सिलसिले में उनà¥?होंने à¤?क रहसà¥?योदà¥?घाटन-सा (कइयों के लिà¤?) किया कि कà¥?रांतिकारी चे गेवारा 1959 में à¤à¤¾à¤°à¤¤ à¤à¥€ आà¤? थे. आज मोहलà¥?ला पर है चे की ख़à¥?द लिखी यातà¥?रा रिपोरà¥?ट जो à¤à¤¾à¤°à¤¤ से वापस लौटकर उनà¥?होंने राषà¥?टà¥?रपति कासà¥?तà¥?रो को सौंपी. अपनी समसà¥?याओं के लिà¤? à¤à¤¾à¤°à¤¤ के हल कà¥?यूबा के हलों से कà¥?यों अलग हैं, इस समà¤? ने उनके नज़रिà¤? को परिपकà¥?वता दी है. लिखते हैं,
यह बहà¥?विध और बहà¥?त बड़ा देश अनेक पà¥?रथाओं और रूढ़â€?ियों का देश है। जिन सामाजिक समसà¥?â€?याओं में हम जी रहे हैं, उनसे उपजे हमारे विचार, उन पà¥?रथाओं और रूâ€?ढ़â€?ियों से बिलà¥?â€?कà¥?ल à¤à¤¿à¤¨à¥?â€?न हैं। सामाजिक-आरà¥?थिक ढांचा हमारा à¤?क सा है। ग़à¥?लामी और औपनिवेशीकरण का वही अतीत, विकास की सीध की दिशा à¤à¥€ वही। इसके बावजूद कि ये तमाम हल काफी मिलते-जà¥?लते हैं और उदà¥?देशà¥?â€?य à¤à¥€ à¤?क ही है, फिर à¤à¥€ इनमें दिन-रात का अंतर है। à¤?क ओर जहां à¤à¥‚मि सà¥?धार की आंधी ने कांपागà¥?â€?वैइ (कà¥?â€?यूबा) की ज़मींदारी को à¤?क ही à¤?टके में हिला कर रख दिया और पूरे देश में किसानों को मà¥?फà¥?त ज़मीन बांटते हà¥?à¤? वह अनवरत रूप से आगे बढ़ रही है : वहीं महान à¤à¤¾à¤°à¤¤ अपनी सà¥?विचारित और शांत पूरà¥?वी अदा के साथ बड़े-बड़े ज़मींदारों को वहां के किसानों को à¤à¥‚दान कर उनके साथ नà¥?â€?याय करना समà¤?ा रहा है।










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