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डब्बाबंद मुल्क में बड़ी होती लड़की..

मनीषा इस पितृसत्तात्मक मुल्क में यौवन की दहलीज पर कदम रखती लड़की का शब्द चित्र खींच रही हैं. 

अच्‍छे घरों की अच्‍छी लड़कियाँ विले पार्ले स्‍टेशन पर उतरते ही अच्‍छी लड़की का चोंगा सीढि़यों के नीचे छिपा कॉलेज और समंदर के सिम्‍त जाने वाली सड़क का रुख करतीं और शाम को घर लौटते हुए सीढि़यों के नीचे से चोंगा उठाती जाती थीं। मुझे फोन करके स्‍वीकारोक्तियाँ करतीं, हाल-ए-दिल बयां करतीं। दीदी, आय एम इन लव। वो टॉल, डार्क, हैंडसम मेरा ब्‍वायॅफ्रेंड है। मैंने हमेशा समझाना चाहा, अच्‍छे लोगों के घर से आजादी तभी मिलेगी, जब अपने पैरों पर खड़ी होगी। वरना ब्‍वॉयफ्रेंड तो आज्ञाकारी पुत्र की तरह इनकम टैक्‍स अफसर की बेटी के साथ लगाएगा फेरे और तुम पैर में आलता लगाकर पति के घर में विम बार से बर्तन धोना। उसे घर ले जाओगी तो तुम्‍हें तो बाद में, ब्‍वॉयफ्रेंड को पहले लातों का हार पहनाया जाएगा।

इसी श्रंखला के अगले भाग में वह कहती हैं.

सीलबंद ढक्‍कन वाले डिब्‍बे जैसी दुनिया में रहती थीं लडकियाँ। डिब्‍बे में कोई आता-जाता तो था नहीं। एक मुई चींटी तक तो आती नहीं। अपने दिल की कहें भी तो किससे। सो डिब्‍बाबंद मुल्‍क की बड़ी होती लड़कियां अपने अकेलेपन को अकेले में ही गुनती-बुनती, अकेले ही जूझती रहतीं सबकुछ से।

मैं भी इसी डिब्‍बाबंद मुल्‍क की एक लड़की थी। बड़ी चाशनी घुली थी, जिंदगी में जवानी की तरंगों के आने से। चाशनी में सिमोन मार्का नारीवाद का छौंका भी लग गया। सब गड्डम-गड्ड।

Comments

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sanjay singh
Apr 18th, 2008 at 7:06 am | #

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