पहाड़ों से पलायन का दर्द
नीरज जोशी पहाड़ से लौट कर आये हैं और अपना दर्द विस्फोट पर सबसे बांट रहे हैं.
गांव के ईर्द गिर्द सिरहाने और पांवों की ओर दो तीन किमी दूर तक छितरे उन सीढ़ीनुमा खेतों के बारे में इस बार अचानक मेरी दिलचस्पी बढ गई। खेतों को दूर दूर तक निहारते हुए यह प्रश्न मेरे जेहन में बार-बार कौंधा कि आखिर इस महाविस्तार में इतने सीढीनुमा खेत किसने बनाये होंगे? अब ये खेत बंजर पडे़ हैं। हमारे शैशव में जिन खेतों पर फसलें लहलहाती थी वहां अब जंगली झाडियॉं और कंटीले पेड़ उग आये है। ऐसा देखना उस आमधारणा के उलट है जो मानती है कि पहले जनसंख्या बहुत कम थी और अब एकाएक विस्फोट की स्थिति में पहुंच गई हैं। फिर ये खेत ऑंखिर बंजर क्यों हो गये? जनसंख्या बढ़ने के साथ उन पर दबाव बढ़ना चाहिए था। पर ये दवाब शून्य ही नही बंजर कर दिये गये हैं। कभी कभी ठहरकर यदि आप नजर डालेंगे तो इस वितान में दूर खडे़ छोटे- छोटे मकानों को देखकर एहसास होगा ये किसी महासभ्यता के ध्वंशावशेष हैं।























