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Archive for the 'Hindi' category

पहाड़ों से पलायन का दर्द

नीरज जोशी पहाड़ से लौट कर आये हैं और अपना दर्द विस्फोट पर सबसे बांट रहे हैं.

गांव के ईर्द गिर्द सिरहाने और पांवों की ओर दो तीन किमी दूर तक छितरे उन सीढ़ीनुमा खेतों के बारे में इस बार अचानक मेरी दिलचस्पी बढ गई। खेतों को दूर दूर तक निहारते हुए यह प्रश्न मेरे जेहन में बार-बार कौंधा कि आखिर इस महाविस्तार में इतने सीढीनुमा खेत किसने बनाये होंगे? अब ये खेत बंजर पडे़ हैं। हमारे शैशव में जिन खेतों पर फसलें लहलहाती थी वहां अब जंगली झाडियॉं और कंटीले पेड़ उग आये है। ऐसा देखना उस आमधारणा के उलट है जो मानती है कि पहले जनसंख्या बहुत कम थी और अब एकाएक विस्फोट की स्थिति में पहुंच गई हैं। फिर ये खेत ऑंखिर बंजर क्यों हो गये? जनसंख्या बढ़ने के साथ उन पर दबाव बढ़ना चाहिए था। पर ये दवाब शून्य ही नही बंजर कर दिये गये हैं। कभी कभी ठहरकर यदि आप नजर डालेंगे तो इस वितान में दूर खडे़ छोटे- छोटे मकानों को देखकर एहसास होगा ये किसी महासभ्यता के ध्वंशावशेष हैं।

अनुपम तालाब साधना

संजय तिवारी उदारीकरण और पर्यावरण के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाते रहे हैं.हाल ही मैं उन्होने विस्फोट पत्रिका को प्रारम्भ किया है. उसी में वह पर्यावरणविद अनुपम मिश्रा जी के बारे में बता रहे हैं.

वे लोकजीवन और लोकज्ञान के साधक हैं. अब न लोकजीवन की कोई परिधि या सीमा है और न ही लोकज्ञान की. इसलिए अनुपम मिश्र भी किसी सीमा या परिचय से बंधें हुए नहीं हैं. हालांकि उन्हें हमेशा ऐतराज रहता है जब कोई उनके बारे में बोले-कहे या लिखे. उन्हें लगता है कि उनके बारे में लिखने से अच्छा है उनकी किताब "आज भी खरे हैं तालाब" के बारे में दो शब्द लिखे जाएं. कितने लाख लोग अनुपम मिश्र को जानते हैं इससे कोई खास मतलब नहीं है कितनी प्रतियां इस किताब की बिकी हैं सारा मतलब इससे है. तो क्या अनुपम मिश्र अपनी रॉयल्टी की चिंता में लगे रहनेवाले व्यक्ति हैं जो अपनी किताब को लेकर इतने चिंतित रहते हैं? शायद. क्योंकि उनकी रायल्टी है कि समाज ज्यादा से ज्यादा तालाब के बारे में अपनी धारणा ठीक करें. पानी के बारे में अपनी धारणा ठीक करे. पर्यावरण के बारे में अपनी धारणा ठीक करे. भारत और भारतीयता के बारे में अपनी धारणा शुद्ध करे. अगर यह सब होता है तो अनुपम मिश्र को उनकी रायल्टी मिल जाती है. और किताब पर लिखा यह वाक्य आपको प्रेरित करे कि इस पुस्तक पर कोई कॉपीराईट नहीं है, तो आप इस किताब में छिपी ज्ञानगंगा का अपनी सुविधानुसार जैसा चाहें वैसा प्रवाह निर्मित कर सकते हैं. यह जिस रास्ते गुजरेगी कल्याण करेगी.

डब्बाबंद मुल्क में बड़ी होती लड़की..

मनीषा इस पितृसत्तात्मक मुल्क में यौवन की दहलीज पर कदम रखती लड़की का शब्द चित्र खींच रही हैं. 

अच्‍छे घरों की अच्‍छी लड़कियाँ विले पार्ले स्‍टेशन पर उतरते ही अच्‍छी लड़की का चोंगा सीढि़यों के नीचे छिपा कॉलेज और समंदर के सिम्‍त जाने वाली सड़क का रुख करतीं और शाम को घर लौटते हुए सीढि़यों के नीचे से चोंगा उठाती जाती थीं। मुझे फोन करके स्‍वीकारोक्तियाँ करतीं, हाल-ए-दिल बयां करतीं। दीदी, आय एम इन लव। वो टॉल, डार्क, हैंडसम मेरा ब्‍वायॅफ्रेंड है। मैंने हमेशा समझाना चाहा, अच्‍छे लोगों के घर से आजादी तभी मिलेगी, जब अपने पैरों पर खड़ी होगी। वरना ब्‍वॉयफ्रेंड तो आज्ञाकारी पुत्र की तरह इनकम टैक्‍स अफसर की बेटी के साथ लगाएगा फेरे और तुम पैर में आलता लगाकर पति के घर में विम बार से बर्तन धोना। उसे घर ले जाओगी तो तुम्‍हें तो बाद में, ब्‍वॉयफ्रेंड को पहले लातों का हार पहनाया जाएगा।

इसी श्रंखला के अगले भाग में वह कहती हैं.

सीलबंद ढक्‍कन वाले डिब्‍बे जैसी दुनिया में रहती थीं लडकियाँ। डिब्‍बे में कोई आता-जाता तो था नहीं। एक मुई चींटी तक तो आती नहीं। अपने दिल की कहें भी तो किससे। सो डिब्‍बाबंद मुल्‍क की बड़ी होती लड़कियां अपने अकेलेपन को अकेले में ही गुनती-बुनती, अकेले ही जूझती रहतीं सबकुछ से।

मैं भी इसी डिब्‍बाबंद मुल्‍क की एक लड़की थी। बड़ी चाशनी घुली थी, जिंदगी में जवानी की तरंगों के आने से। चाशनी में सिमोन मार्का नारीवाद का छौंका भी लग गया। सब गड्डम-गड्ड।

क्या स्त्री का भविष्य अन्धकार-मय है?

ईस्वामी पिछ्ले एक दशक से अमरीका में रह रहे हैं. वहां के समाज को वह नजदीक से देखते आये हैं और उसको लेकर उनका एक नजरिया भी है. अमरीका के नारीवादी अन्दोलन के खतरों के प्रति सतर्क करते हुए वह भारत की स्त्रीयों को अमरीकी आन्दोलन का अन्धानुकरण न करने की सलाह दे रहे हैं. 

 

भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे दिया लगता है! उन्ही की तर्ज पर आपको नारीवादी होने के लिये पुरुष-विरोधी होने की जरूरत क्यों पडती है?

पश्चिमी नारी नें बराबरी का नारा बुलंद किया - वोट देने का अधिकार, न्याय का अधिकार, समान वेतन का अधिकार वो सब भारतीय नारी के पास कानूनी रूप से सुरक्षित ही है.

इसके आगे सामाजिक स्थिती के मामले में भारतीय नारी क्या चाहती है खुद उसे नहीं पता! वैसे उसका भविष्य कितना अंधकारमय है इसकी जानकारी भी उसे नहीं है.

पश्चिमी शैली की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का नारा बुलन्द करती वर्किंग वुमन हो चुकने, आर्थिक स्वतंत्रता, समानता के नाम पर कुछ हद तक चारित्रिक स्वछंदता आदी के लिये चिल्ल-पों करती वीरांगनाओं को अपने से तीस-पैंतीस साल या २-३ पीढियों पहले यही सब कर चुकी पश्चिमी महिलाओं का हश्र देखना चाहिए!

पुरी की यात्रा के अनुभव व धर्म

सुनील दीपक अभी अभी भारत यात्रा से लौटे हैं.पुरी (उड़ीसा) में जगन्नाथ मंदिर की यात्रा करते समय कुछ बातें उनके मन में आयी जिन्हे वह हमारे साथ बांट रहे हैं. 

वैसे व्यक्तिगत रूप में मेरे लिए धार्मिकता और मंदिर में जा कर पूजा करने में कोई विषेश सम्बंध नहीं क्योंकि मेरे लिए धार्मिकता अधिक आध्यात्मिक एवं अंतर्मुखी है. धर्म और आस्था पर बात करना मुझे कठिन भी लगता है क्योंकि महसूस करता हूँ कि इस बारे में मेरे विचार स्पष्ट नहीं, और कई बार अंतर्विरोधी भी है. यह भी लगता है कि कितना भी लिख लो, कुछ न कुछ बात अधूरी ही रह जायेगी.

काग़ज़ की कश्‍ती डूब गयी…

"ये काग़ज़ की कश्‍ती वो बारिश का पानी’ लिखने वाले सुदर्शन फ़ाकिर नहीं रहे…उन्ही को श्रद्धांजली देते हुए युनुस उनकी कुछ चुनिदा नज्मों से परिचय करवा रहे हैं.

सुदर्शन फाकिर जिंदगी भर गुमनाम रहे, वो उन शायरों में से नहीं थे जो टेलीविजन या रेडियो की दुनिया में छाए रहें।वो ज्‍यादा इंटरव्‍यू भी नहीं देते थे । ये विडंबना ही है कि शायर सुदर्शन फाकिर की ग़ज़लें उनके नाम से ज्‍यादा लोकप्रिय हुईं।और नामवर हो गये वो लोग जिन्‍होंने सुदर्शन फाकिर को गाया।सुदर्शन तो बस चंडीगढ़ में एक गुमनाम जिंदगी जीते रहे और चुपके से चले भी गए।शायद मौत के ज़रिए भी सुर्खियों में आना उनको मंजूर नहीं था ।

दिहाड़ी मजदूर

ज्ञानदत्त पाण्डेयजी नियमित लिखने वाले हैं। उनका ब्लाग उनकी मानसिक हलचल का आईना है। वे जहां कहीं जाते हैं , उनका कैमरा उनके साथ होता है। कल ‘डिटूर’ पर निकले तो दिहाड़ी मजूर दिखे। आप भी उनकी नजर से देखिये -

जहां ये लोग इकठ्ठा होते हैं, वहां रेल की संकरी पुलिया है। सड़क भी ऊबड़ खाबड़ है। लिहाजा वाहन धीरे धीरे निकलता है वहां से। सड़क के दोनो ओर बैठे हुये लोगों का अच्छा अवलोकन हो जाता है। कुछ तो पूरी बांह का स्वेटर पहने, मफलर लगाये और सिर पर टोपी रखे होते हैं। कुछ के पास तो गरम कपड़े दीखते ही नहीं। यूंही कंपकंपाते गुड़मुड़ बैठे नजर आते हैं। कुछ के पास साइकलें होती हैं। कुछ बिना साइकल होते हैं। इक्का-दुक्का के पास दोपहर के भोजन के डिब्बे भी नजर आते हैं।

इन दिहाड़ी मजूरों की जिंदगी का संपन्न लोगों से अध्ययन करते हुये वे कहते हैं-

आदमी आखिर निरपेक्ष नहीं, तुलनात्मक अवस्था में जीता है। किसी बड़े उद्योगपति को मेरी अवस्था में डाल दें तो शायद वह आत्महत्या कर ले! लिहाजा उस कोण से सोचना तो इन लोगों को ग्लैमराइज और अपने को निरर्थक बताना होगा। पर यह जरूर है कि ये लोग देश के निर्माण में कण्ट्रीब्यूट करने में हमसे कमतर नहीं – शायद ज्यादा ही होंगे।

आगे वे इनसे जुड़ने के अपनी मंशा भी जाहिर करते हैं ताकि उनकी सोच में परिवर्तन आ सके-

मैं इस अवस्था में दिहाड़ी पर मजदूरी शायद न करूं या न कर सकूं; पर ब्रिकलेयर एसोशियेशन का सदस्य अवश्य बनना चाहूंगा। और अगर ऐसी कोई एसोशियेशन भारत में न हो तो कम से कम राज-मिस्त्री का काम जानना चाहूंगा। उससे श्रम की महत्ता पर मेरी सोच में गुणात्मक परिवर्तन आयेगा।

क्या मैं पतित होना नहीं चाहती ?

प्रत्यक्षा का आत्मालाप कमोबेश हर एक स्त्री और पुरुष का आत्मालाप हो सकता है.जरूरत है तो इसे अपने अंदर कुरेदने की.

मैं प्रगतिशील कहलाने के लिये पश्चिमी कपड़े पहनूँ , गाड़ी चलाऊँ , सिगरेट शराब पियूँ , देर रात आवारागर्दी करूँ ऐसे स्टीरियोटाइप में नहीं फँसना चाहती । मैं ये सिर्फ तब ही करना चाहूँगी जब ये करना मेरी मर्जी में होगा , सिर्फ किसी और के बनाये ढाँचे में फिट होने या मात्र फॉर द सेक तोड़ फोड़ करने के लिये नहीं । मेरे चुनाव मेरे अपने होंगे किसी और के थोपे हुये नहीं । मेरे रास्ते मेरे होंगे , उनके काँटे भी मेरे , फूल तो मेरे ही ।

आम बजट की खास खास बातें

देश का बजट एक सालाना कार्यक्रम है इसी के बारे में अपने व्यंग्यात्मक लहज़े में शिवकुमार मिश्र पूरा का पूरा निबेंध छाप दे रहे हैं. उनका यह निबंध भारतीय आम बजट की खास खास बातों से परिचय कराता है.

बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यक्रमों के अलावा एक और कार्यक्रम होता है जिसे बजट के ‘टीवीय विमर्श’ के नाम से जाना जाता है. ऐसे विमर्श में टीवी पर बैठे पत्रकार और उद्योगपति बजट देखकर वित्तमंत्री को नम्बर देने का सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाते हैं. देश में लोकतंत्र है, इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण बजट के दिन देखने को मिलता है. एक ही बजट पर तमाम उद्योगपति और जानकार वित्तमंत्री को दो से लेकर दस नम्बर तक देते हैं. लोकतंत्र पूरी तरह से मजबूत है, इस बात को दर्शाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों में बीच-बीच में ‘आम आदमी’ का वक्तव्य भी दिखाया जाता है.

पतनशील बनाम प्रगतिशील

चन्द्रभूषण या यानि चन्दू भाई हमेशा से ज्वलंत मुद्दों पर अपनी लेखनी चलाते रहे हैं. अब वह पतनशील और प्रगतिशील को अपने निजी अनुभव से तोल रहे हैं.

जमूरे की तरह उछल-उछलकर बात-बात पर बोलने की मेरी आदत नहीं है, न ही किसी बहस में इसलिए शामिल होता हूं कि लाला लोग इस जगह पड़ी टीपें गिनें ताकि देर-सबेर दो पैसे का जुगाड़ हो। मेरे लिए कोई भी शब्द सिर्फ बौद्धिक फैशन के लिए ग्राह्य या त्याज्य नहीं है। भाषा का जो भी हिस्सा मेरे दिल से नहीं सटता उसका मेरे लिए कोई मतलब नहीं है और जो सटता है उसे बचाने के लिए मैं जान देने और लेने की हद तक जाने में भी कोई बुराई नहीं समझता।

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